Sumitranandan Pant ka jivan parichay : सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय

Sumitranandan Pant ka jivan parichay

Sumitranandan Pant ka jivan parichay

यहाँ पर आपको Sumitranandan Pant ka jivan parichay में इनके बचपन ले लेकर इनके आखरी समय के बारे में कुछ बात करेंगे । कवि सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय में इनकी शिक्षा और इनकी रचनाओ के बारे में भी यहाँ पर बताया गया है । इनका जीवन काल 1900 – 1977 तक था लेकिन इन्हें हिंदी साहित्य के इतिहास में हमेशा याद रखा जायेगा । इनके जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है ।

सुमित्रानंदन पंत का जन्म

सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई सन् 1900 ई। में उत्तराखंड राज्य के बागेश्वर ज़िले के ग्राम कौसानी में हुआ था, सुमित्रानंदन पंत भारतीय हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध छायावादी कवि थे । सुमित्रानंदन पंत के पिता का नाम गंगा दत्त पन्त और माताजी का नाम सरस्वती देवी था । इनके बचपन का नाम गुसाई दत्त था बाद में इन्होने अपने स्कूल के समय में अपना नाम सुमित्रानंदन पन्त रख लिया था । आज पूरा भारत इन्हें सुमित्रानंदन पन्त के नाम से जानता हैं ।

इनकी माता सरस्वती देवी जी का देहांत इनके जन्म के कुछ समय बाद ही हो गया था इसलिए इनका बचपन में पालन पोषण इनकी दादी जी के द्वारा किया गया था । सुमित्रानंदन पंत को बचपन से ही कवितायेँ लिखने का शौक था । बहुत कम उम्र में कक्षा 4 में इन्होने अपनी पहली कविता लिखी थी और 1918  में महज 18 वर्ष की आयु में ही हिंदी साहित्य में अपनी ख़ास पहचान बना ली थी ।

सुमित्रानंदन पंत की शिक्षा

Sumitranandan Pant ka jivan parichay में अब इनकी शिक्षा के बारे में जानते हैं; सुमित्रानंदन पंत की शिक्षा की शुरुआत उत्तराखंड में इनके गॉंव के स्थानीय विद्यालयों में हुई । 1918 में यह अपने भाई के साथ काशी चले गए वहीं से इन्होने हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त की । इसके बाद यह शिक्षा प्राप्त करने के लिए इलाहाबाद चले गए । सन् 1920 में जब महात्मा गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया जो दो वर्ष तक चला, उसमे सरकारी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, कार्यालय आदि का वहिष्कार किया गया । इस आन्दोलन में सहयोग देने के लिए सुमित्रानंदन पंत जी ने कॉलेज छोड़ दिया । इसके बाद इन्होने हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य आदि का अध्ययन घर पर ही किया । उनके विद्यार्थी जीवन ने उनकी साहित्यिक रूचि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।

सुमित्रानंदन पंत का साहित्य इतिहास

सुमित्रानंदन पंत जी को बचपन से ही कवितायेँ लिखने का शौक था । कहा जाता है कि जब वे कक्षा 4 में थे तो उन्होंने एक कविता लिखी थी । लेकिन इनका साहित्य इतिहास सन् 1916 से 1977 यानि इनके आखरी समय तक माना जाता है । इनके समय में छायावाद का दौर था, उस समय पंत जी को युगप्रवर्तक कवि और युगंतकारी कवि के रूप में जाना जाता था । सुमित्रानंदन पंत ने भारतीय साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका साहित्य इतिहास उनके साहित्यिक क्रियाकलापों के माध्यम से जाना जाता है। उनकी कविताओं में प्रकृति, प्रेम, स्वतंत्रता, और राष्ट्रभक्ति जैसे विषयों पर गहरा चिंतन है। उन्होंने रस, छन्द, और अलंकार का विवेचन किया और अपनी कविताओं में उन्हें सजीवता और गहराई प्रदान की।

सुमित्रानंदन पंत की कहानियाँ भी उनके साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने विभिन्न विषयों पर कहानियों के माध्यम से सामाजिक संदेशों को प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर चिंतन किया। सुमित्रानंदन पंत का साहित्य भारतीय साहित्य के इतिहास में बहुत बड़ा योगदान माना जाता है ।

सुमित्रानंदन पंत की कुछ साहित्यिक रचनाएँ

Sumitranandan Pant ka jivan parichay में यहाँ देखिये इनकी कुछ रचनाएँ; सुमित्रानंदन पंत की साहित्यिक रचनाएँ विभिन्न शैलियों में विविधता और गहराई से भरी हुई हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:-

क्र.स.रचनाएँ
1वीणा
2ग्रंथि
3पल्लव
4गुंजन
5ज्योत्सना
6युगांत
7युगवाणी
8स्वर्णकिरण
9स्वर्णधूलि
10उत्तरा
11युगपथ
12चिदंबरा
13कला और बूढ़ा चाँद
14लोकायतन
15गीतहंस
सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ

कवि सुमित्रानन्दन पंत की साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त काव्यकृति है “कला और बूढ़ा चाँद” है । इनके अलावा, सुमित्रानंदन पंत ने अनेक छोटी बड़ी कहानियाँ, निबंध, और लेख भी लिखे हैं, जो उनके साहित्यिक योगदान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सुमित्रानंदन पंत को हिंदी साहित्य सेवा के लिए कई पुरस्कार मिले थे । उनकी रचनाएँ भारतीय साहित्य के अमूल्य धरोहर हैं, जिन्होंने भारतीय समाज की समस्याओं, मूल्यों, और धार्मिक तत्वों को गहराई से छूने का प्रयास किया है।

सुमित्रानंदन पंत की मृत्यु

सुमित्रानंदन पंत की मृत्यु इलाहाबाद में 77 वर्ष की आयु में 28 दिसम्बर सन् 1977 को हुई थी । हिंदी साहित्य के इतिहास में हमेशा इनका नाम सुनहरे अक्षरों से लिखा जायेगा । इन्होने हिंदी साहित्य में अपनी एक ख़ास पहचान बनाई जिस कारण लोग इन्हें हमेशा याद रखेंगे ।

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